टीएचडीसी की टनल में हादसों का सिलसिला, सुरक्षा इंतजामों पर उठे सवाल

-बीते वर्ष दिसम्बर में दो लोको ट्रेन थी टकराईं

-अब मलबे-पानी से सात की मौत, तीन अब भी लापता

गोपेश्वर (चमोली)। चमोली जिले के मायापुर (पीपलकोटी) में टीएचडीसी की निर्माणाधीन टनल के भीतर हुए हादसे ने एक बार फिर सुरंग परियोजनाओं में कार्यरत मजदूरों और कर्मचारियों की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। गुरूवार की सांय को टनल के अंदर मलबा और पानी आने के बाद हुए जलभराव में सात लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि तीन लोग अभी भी लापता बताए जा रहे हैं। हादसे में 12 लोग घायल हुए हैं, जिनका उपचार चल रहा है। इनमें एक गंभीर घायल को हायर सेंटर रेफर किया गया है।

हादसे के बाद सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि आखिर टनल के अंदर काम कर रहे श्रमिकों की सुरक्षा के लिए किस तरह की व्यवस्था की गई थी और क्या आपदा की स्थिति में वहां से श्रमिकों को सुरक्षित बाहर निकालने के लिए पर्याप्त इंतजाम मौजूद थे। लगातार दो घटनाओं ने सुरक्षा व्यवस्था की निगरानी और जोखिम प्रबंधन को लेकर सवाल और गहरे कर दिए हैं।

बीते वर्ष दिसंबर माह में भी हुआ था हादसा

मायापुर-पीपलकोटी की टीएचडीसी की ही टनल में बीते वर्ष दिसम्बर माह में भी हादसा हो चुका है। उस समय टनल के अंदर दो लोको ट्रेन आपस में टकरा गई थीं। इस घटना में कई मजदूर घायल हुए थे। उस हादसे के बाद भी टनल के भीतर सुरक्षा व्यवस्था को लेकर सवाल उठे थे। अब करीब कुछ महीनों के अंतराल में एक बार फिर टनल के भीतर बड़ा हादसा हो गया है। इस बार स्थिति और भयावह रही। भारी मलबे और पानी के टनल के भीतर पहुंचने से जलभराव हो गया और कई श्रमिक इसकी चपेट में आ गए। सात लोगों की मौत और तीन लोगों के अब भी लापता होने से हादसे की गंभीरता का अंदाजा लगाया जा सकता है।

क्या पिछले हादसे से नहीं लिया गया सबक

लगातार सामने आ रही घटनाओं ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या पिछले हादसे के बाद सुरक्षा मानकों की गंभीरता से समीक्षा की गई थी। यदि समीक्षा हुई थी तो उसके आधार पर क्या सुधारात्मक कदम उठाए गए और क्या टनल के अंदर आपातकालीन स्थिति से निपटने की व्यवस्था को मजबूत किया गया था?

विशेषज्ञों के अनुसार सुरंग निर्माण कार्य बेहद जोखिमपूर्ण होता है। पहाड़ी क्षेत्रों में अचानक मलबा आने, पानी का रिसाव बढ़ने, जलभराव होने अथवा भूगर्भीय परिस्थितियों में बदलाव जैसी घटनाओं का खतरा हमेशा बना रहता है। ऐसे में टनल के भीतर काम करने वाले प्रत्येक श्रमिक की सुरक्षा के लिए आपात निकासी मार्ग, जल निकासी व्यवस्था, संचार तंत्र, चेतावनी प्रणाली और नियमित सुरक्षा अभ्यास बेहद महत्वपूर्ण होते हैं।

वर्करों की सुरक्षा बनी सबसे बड़ा सवाल

हादसे के बाद टनल में कार्यरत मजदूरों के बीच भी सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ना स्वाभाविक है। रोजी-रोटी के लिए सुरंग के भीतर काम करने वाले श्रमिकों के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि अचानक कोई आपदा आती है तो उन्हें सुरक्षित बाहर निकालने की व्यवस्था कितनी प्रभावी है।

टनल के अंदर काम करने वाले श्रमिकों को संभावित खतरे की जानकारी, आपातकालीन स्थिति में बाहर निकलने का सुरक्षित रास्ता और तत्काल सूचना देने की व्यवस्था कितनी उपलब्ध है, इसकी भी जांच जरूरी है।

सिर्फ राहत-बचाव नहीं, सुरक्षा ऑडिट भी जरूरी

मौजूदा हादसे के बाद राहत और बचाव अभियान प्राथमिकता है, लेकिन इसके साथ ही पूरी परियोजना की सुरक्षा व्यवस्था का स्वतंत्र और व्यापक ऑडिट भी जरूरी हो गया है। यह देखा जाना चाहिए कि टनल में पानी और मलबे के प्रवेश की स्थिति क्यों बनी, जल निकासी की व्यवस्था कितनी प्रभावी थी और क्या खतरे के संभावित संकेतों की पहले से पहचान की जा सकती थी। इसके अलावा दिसंबर 2025 में हुए लोको ट्रेन हादसे और मौजूदा दुर्घटना को भी एक साथ रखकर देखा जाना जरूरी है। दोनों घटनाओं की प्रकृति अलग है, लेकिन दोनों ने टनल के अंदर कार्यरत श्रमिकों की सुरक्षा को लेकर सवाल खड़े किए हैं।

जवाबदेही तय करने की मांग

हादसे में सात लोगों की मौत और तीन लोगों के लापता होने के बाद अब प्रभावित परिवारों को राहत और मुआवजे के साथ यह भी तय होना चाहिए कि दुर्घटना के पीछे वास्तविक कारण क्या रहे। यदि किसी स्तर पर सुरक्षा मानकों की अनदेखी सामने आती है तो उसकी जवाबदेही भी तय की जानी चाहिए।

स्थानीय स्तर पर यह मांग भी उठ रही है कि टनल के भीतर काम कर रहे श्रमिकों की सुरक्षा व्यवस्था की उच्चस्तरीय जांच कराई जाए। साथ ही भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए ठोस सुरक्षा प्रोटोकॉल लागू किए जाएं।

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